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गरमी की दोपहर

कहते हैं कि किसी हिन्दू औरत को मुसलमान-मर्द के साथ अकेला नहीं छोड़ना चाहिये क्योंकि मुसलमान मर्द उसे पकड़ कर चोदने की ही सोचेगा। कैसे इसकी रसीली हिन्दू चूत में अपना मुसलमानी लण्ड डाल दूँ – यही ख्याल उसके मन में कुलबुलायेगा। मेरे साथ ऐसा ही हुआ।

गरमी के दिन थे और भरी दोपहर थी। मैं अपने घर में अकेला था क्योंकि मेरी शरीके हयात अभी बच्चों के साथ अपने मायके गई हुई थी। मैंने घर में कुछ ज़रूरी काम करने के लिये ऑफिस से छुट्टी ले रखी थी। काम निबटा कर मैं बेडरूम में ठंडी बीयर का आनन्द ले रहा था।

करीब एक बजे दरवाजे पर हुआ टिंग-टोंग! दरवाजा खोला तो सामने मानो एक चुदासी हिन्दू रण्डी खड़ी थी। अट्ठाईस – तीस साल की हल्की साँवली और गज़ब की सुंदर औरत साड़ी पहने हुए और हाथों में कागज़ और कलम लिये हुए खड़ी थी। उसके बदन मैं एक गज़ब का आकर्षण था, माँग मे सिन्दूर, गले मे मंगलसूत्र, तनी हुई मादक चूचियां जो उनके कसे हुए ब्लाउज़ से बाहर निकलने को बेताब थी औंर पतली कमर , सपाट पेट जिसके काफी नीचे उसकी साड़ी बधीं थी, फिर उसने कोयल की आवाज़ में बोली, “माफ़ कीजियेगा! क्या कोई लेडी हैं घर में?”

मैंने कहा, “जी नहीं, मैं ही हूँ और अकेला ही रहता हूँ। आप कौन हैं?”

उसके माथे पर पसीने की कुछ बूंदें थी। उसने मेरे कुर्ते औंर लुन्गी , लम्बी दाड़ी औंर सिर पर टोपी को गौर से देखा फिर थोड़ा हिचकिचाहट के साथ बोली, “ज़रा एक ग्लास पानी मिलेगा?”

मैंने कहा, “हाँ, क्यों नहीं?”

वोह ज़रा सा अंदर आयी। मैंने पानी का ग्लास देते हुए पूछा, “क्या बात है, आप हैं कौन?”

पानी पी कर वोह बोली, “जी मेरा नाम सरिता गहरवार है और मुझे एक कनज़्यूमर कंपनी ने भेजा है सर्वे के लिये। क्या आप मेरे कुछ सवालों का जवाब दे देंगे?”

मैंने कहा, “जी कोशिश कर सकता हूँ। आप प्लीज़ यहाँ बैठ जाइये।”

वोह सोफ़े पर बैठ गयी और हमारे घर का दरवाजा अभी खुला ही था। मैंने दूसरे सोफ़े पर बैठ कर कहा, “पूछिये जो पूछना है।”

वो बोली, “जी आपका नाम और आपकी उम्र क्या है?”

“जी मैं मुहम्मद शब्बीर हूँ और उम्र बयालिस साल!” मैंने जवाब दिया।

“आप अपने घर की ज़रूरत की चीजें कहाँ से खरीदते हैं?” इस तरह वो सवाल पर सवाल पूछती रही और मैं जवाब देता गया।

कुछ देर बाद मैंने पूछा, “इस तरह इतनी गर्मी के वैदर में भी आप क्या सब घरों में जाकर सर्वे करती हैं?”

“जी, जॉब तो जॉब ही है ना।”

“तो आप शादी शुदा हो कर भी जॉब कर रही हैं?”

अब वो भी थोड़ी-सी खुल सी गयी। बोली, “क्यों, शादी शुदा औरत जॉब नहीं कर सकती?”

“जी यह बात नहीं, घर-घर जाना, जाने किस घर में कैसे लोग मिल जायें?”

उसने जवाब दिया, “वैसे तो दिन के वक्त ज्यादातर हाऊज़वाइफ ही मिलती हैं। कभी-कभी ही कोई मेल मेंबर होता है।”

“तो आपको डर नहीं लगता।”

“जी अभी तक तो नहीं लगा। फिर आप जैसे शरीफ इंसान मिल जायें तो क्या डर?”

‘शरीफ इंसान’ – एक बार तो सुन कर अजीब लगा। इसे क्या मालूम कि मैं इसे किस नज़र से देख रहा था। साड़ी और ब्लाऊज़ के नीचे उसकी चूचियाँ तनी हुई थीं और मेरे मुसलमानी लण्ड में खुजली सी होने लगी। जी चाह रहा था कि काश सिर्फ़ एक बार चूम सकता और ब्लाऊज़ के नीचे उसकी गदरायी चूचियों को दबा सकता। हाथों कि अँगुलियाँ लंबी-लंबी मुलायम सी। वैसे ही मुलायम से सैक्सी पैर ऊँची ऐड़ी के सैंडलों में कसे हुए। देख-देख कर मेरा सुलेमानी लण्ड खड़े हो ही गये। मन में ज़ोरों से ख्याल आ रहा था कि क्या गज़ब की चुदासी हिन्दू रण्डी है। इसकी तो रसीली हिन्दू चूत को हाथ लगाते ही शायद हाथ जल जायेगा।

तभी वोह बोली, “अच्छा, थैंक्स फ़ोर एवरीथिंग। मैं चलती हूँ।”

मानो पहाड़ टूट गया मेरे ऊपर। चली जायेगी तो हाथ से निकल ही जायेगी। अरे मुहम्मद, हिम्मत करो, आगे बढ़ो, कुछ बोलो ताकि रुक जये। इसकी रसीली हिन्दू चूत में अपना मुसलमानी लण्ड नहीं डालना है क्या? रसीली हिन्दू चूत में मुसलमानी लण्ड? इस ख्याल ने बड़ी हिम्मत दी।

“माफ़ कीजियेगा सरिता जी, आप जैसी खूबसूरत औरत को थोड़ा केयरफुल रहना चाहिये।” मैंने डरते हुए कहा।

“खूबसूरत?”

मैं थोड़ा सा घबराया, लेकिन फिर हिम्मत करके बोला, “जी, खूबसूरत तो आप हैं ही। बुरा मत मानियेगा। आप प्लीज़ अब तो चाय पी कर ही जाइये।”

“चाय, लेकिन बनायेगा कौन?”

“मैं जो हूँ, कम से कम चाय तो बना ही सकता हूँ।”

वोह हंसते हुए बोली, “ठीक है… लेकिन इतनी गर्मी में चाय की बजाय कुछ ठंडा ज्यादा मुनासिब होगा!”

मैंने कहा, “क्यों नहीं… क्या पीना पसंद करेंगी… नींबू शर्बत या पेप्सी… वैसे मैं भी आपके आने के पहले चिल्ड बीयर ही पी रहा था!”

“तो फिर अगर आपको एतराज़ ना हो तो मैं भी बीयर ही ले लूँगी!” मुझे उससे इस जवाब की उम्मीद नहीं थी लेकिन मुझे बहुत खुशी हुई। मैंने उसे फिर बैठने को कहा और किचन में जाकर दो ग्लास और फ्रिज में से हेवर्ड फाइव थाऊसैंड बीयर की दो ठंडी बोतलें निकाल कर ले आया। हम दोनों बीयर पीने लगे और इधर मेरा मुसलमानी लण्ड उबल रहा था। बहुत.दिनों बाद किसी खूबसूरत हिन्दू औरत के साथ बैठ कर बीयर पी रहा था और वो भी इतनी सुंदर हिंदू औरत – और मुझे पता नहीं था कि कैसे आगे बढ़ूँ।

तभी वो बोली, “आप अकेले रहते हैं… आपकी पत्नी औंर बच्चे कहाँ हैं? ?”

मैंने जवाब दिया, “मेरी बेगम औंर बच्चो को लेकर अपने वालिद के यहां गई हैं, और मैं यहां अकेला !।” मैंने अब और हिम्मत कर के कहा, “सरिता जी, आप वाकय में बहुत खूबसूरत हैं। और बहुत अच्छी भी। आपके हसबैंड बहुत ही खुशनसीब इंसान हैं।”

“आप प्लीज़ बार-बार ऐसे ना कहिये। और मुझे सरिता जी क्यों कह रहे हैं। मैं उम्र में आपसे काफी छोटी हूँ ” वो इतराते हुए अदा से मुस्कुरा कर बोली।

यह हिंट काफ़ी था मेरे लिये। मैं समझ गया कि ये अब यह चुदासी हिन्दू रण्डी चुदवाने को आसानी से तैयार हो जायेगी। हमारी बीयर भी खतम होने आयी थी।

“ठीक है, सरिता जी नहीं… सरिता… तुम भी मुझे आप-आप ना कहो! वैसे तुम कितनी खूबसूरत हो, मैं बताऊँ?”

“कहा तो है तुमने कईं बार। अब भी बताना बाकी है?”

“बाकी तो है। अपनी बीयर खतम करके बस एक बार अपनी आँखें बन्द करो… प्लीज़।”

दो-तीन घूँट में जल्दी से बीयर खतम करके उसने आँखें बंद की। मैंने कहा, “आँखें बंद ही रखना।” मैंने उसे कुहनी से पकड़ कर खड़ा किया और हल्के से मैंने उसके गुलाबी-गुलाबी नर्म-नर्म होंठों पर अपने होंठ रख दिये। एक बिजली सी दौड़ गयी मेरे शरीर में। मुसलमानी लण्ड एकदम तन गया और लुन्गी से बाहर आने के लिये तड़पने लगा। उसने तुरन्त आँखें खोलीं और आवाक सी मुझे देखती रही और फिर मुस्कुरा कर और शर्मा कर मेरी बाँहों में आ गयी। मेरी खुशी का ठिकाना ही नहीं रहा। कस कर मैंने उसे अपनी बाँहों में दबोच लिय। ऐसा लग रहा था बस यूँ ही पकड़े रहूँ। फिर मैंने सोचा कि अब समय नहीं बर्बाद करना चाहिये। पका हुआ फल है, बस खा लो।

तुरंत अपनी बाँहों में मैंने उसे उठाया (बहुत ही हल्की थी) और बेडरूम में लाकर बिस्तर पर लिटा दिया। उसकी आँखों में प्यास नज़र आ रही थी। साड़ी और सैंडल पहने हुए बिस्तर पर लेटी हुई वो प्यार भरी नज़रों से मुझे देख रही थी। ब्लाऊज़ में से उसके बूब्स ऊपर नीचे होते हुए देख कर मैं पागल हो गया। आहिस्ते से साड़ी को एक तरफ़ करके मैंने उसकी दाहिनी चूंची को ऊपर से हल्के से दबाया। एक सिरहन सी दौड़ गयी उसके शरीर में।

वो तड़प कर बोली, “प्लीज़ मुहम्मद! जल्दी से! कोई आ ही ना जाये।”

“घबराओ नहीं, सरिता डार्लिंग। बस मज़ा लेती रहो। आज मैं तुम्हे दिखला दूँगा कि प्यार किसे कहते हैं। खूब चोदूँगा मेरी रानी।” मैं एकदम फ़ोर्म में था। यह कहते हुए मैंने उसकी चूचियों को खूब दबाया और होंठों को कस-कस कर चूसने लगा। फिर मैंने कहा, “चुदवाओगी ना?”

आह! गज़ब की कातिलाना मुस्कुराहट के साथ बोली, “मुहम्मद! तुम भी… बहुत बदमाश हो… तो क्या बीयर पी कर यहाँ तुम्हारे बिस्तर पे तीन पत्ती खेलने के लिये तुम्हारे आगोश में लेटी हूँ! अब इस भरी दोपहर में दर-दर भटकने की बजाय यही अच्छा है।”

“सरिता रानी, बदमाश तो तुम भी कम नहीं हो!” और उसके नर्म-नर्म गालों को हाथ में ले कर होंठों का खूब रसपान किया। मैं उसके ऊपर चढ़ा हुआ था और मेरा मुसलमानी लण्ड उसकी रसीली हिन्दू चूत के ऊपर था। रसीली हिन्दू चूत मुझे महसूस हो रही थी और उसकी चूचियाँ… गज़ब की तनी हुई… मेरे सीने में चुभ-चुभ कर बहुत ही आनंद दे रही थी। दाहिने हाथ से अब मैंने उसकी बाँयी चूंची को खुब दबाया और एक्साईटमेंट में ब्लाऊज़ के नीचे हाथ घुसा कर उसे पकड़ना चाहा।

“मुहम्मद, ब्लाऊज़ खोल दो ना।” उसका यह कहना था और मैंने तुरन्त ब्लाऊज़ के बटन खोले और उसे घुमा कर साथ ही साथ ब्रा का हुक खोला और पीछे से ही उसके बूब्स को पुरा समेट लिया। आहा, क्या फ़ीलिंग थी, सख्त और नरम दोनों, गरम मानो आग हो। निप्पल एकदम तने हुए। जल्दी-जल्दी ब्लाऊज़ और ब्रा को हटाया। साड़ी को परे किया और पेटीकोट के नाड़े को खोल कर उसे हटाया। पिंक चड्ढी और सफेद हाई-हील के सैंडल पहने हुए सरिता को नंगी लेटी हुई देख कर तो मैं बर्दाश्त ही नहीं कर सका। मैंने अब अपने कपड़े जल्दी-जल्दी उतारे। मुसलमानी लण्ड तन कर बाहर आ गया और ऊपर की तरफ़ हो कर तड़पने लगा। उसका एक हाथ ले कर मैंने अपने फड़कते हुए मुसलमानी लण्ड पर रख दिया।

“उफ हे भगवान कितना बड़ा और मोटा है सच मे आप मुसलमान” मर्दों का खतना किया हुआ सुल्तान कितना बडा औंर खतरनाक होता है।” वोह बोली और आहिस्ता-आहिस्ता मुसलमानी लण्ड को आगे पीछे हिलाने लगी। शादी शुदा हिन्दू औरत को चोदने का यही मज़ा है। कुछ शरम नहीं करती, वो सब जानती है और आमतौर पर शादी शुदा हिन्दू औरतें फैमली प्लैनिंग के लिये पिल्स या कोई और इंतज़ाम करती हैं तो कंडोम की भी ज़रूरत नहीं।

मैंने आखिर पूछ ही लिया, “सरिता डार्लिंग, कंडोम लगाऊँ?”

वो मुँह हिलाते हुए मना करते हुए खिलखिलायी, “सब ठीक है। मैं पिल्स लेती हूँ।” , “औंर फिर एक मुसलमान मर्द से चुदाई का असली मजा़ तो बिना कन्डोम के ही है।”

मैंने अब उसके बदन से उस पिंक चड्ढी को हटाया और इतमिनान से उसकी रसीली हिन्दू चूत को निहारा। एक दम साफ चिकनी सुंदर सी रसीली हिन्दू चूत थी। कुछ फूली हुई थी। मैंने उसके ऊपर हाथ रखा और हल्के से दबाया। अँगुली ऐसे घुसी जैसे मक्खन में छूरी। रस बह रहा था और रसीली हिन्दू चूत एकदम गीली थी। सरिता की चुदासी हिन्दू चूत की मदमस्त खुशबू पूरे कमरे मे फैल गई थी। मैं जैसे सब कुछ एक साथ कर रहा था। कभी उसके रसीले होंठों को चूसता, मादक चूचियों को दबाता – कभी एक हाथ से कभी दोनों से। एकदम टाइट गोल और तनी हुई चूचियाँ। उसके सोने जैसे बदन पर कभी हाथ फिराता। फिर मैंने उसकी चूचियों को खूब चूसा और अँगुलियों से उसकी चुदासी हिंदू चूत में खूब अंदर बाहर करके हिलाया।

“सरिता, अब मैं नहीं रह सकता, अब तो चोदना ही पड़ेगा। कस-कस कर चोदूँगा मेरी रानी।”

पहली बार उसके मुँह से अब सुना, “चोद दो ना मुहम्मद, बस अब चोद दो, इस तडपती हिंदू औरत को, हे भगवान, उम्म्म् क्या मर्दानगी की खुशबू हैं मुहम्मद जी, आपके इस मर्दाने जिस्म की।”

मज़ा लेते हुए मैंने पूछा, “क्या चोदूँ मेरी चुदासी हिंदू रण्डी। एक बार फिर से कहो ना। तेरे मुँह से सुनने में कितना अच्छा लग रहा है।”

“अब चोदो ना… इस… इस रसीली हिन्दू चूत को, मेरे मुसलमान राजा…..”

“अब मैं तेरी गरम-गरम और गुलाबी-गुलाबी चुदासी हिंदू चूत में अपना ये मुसलमानी लण्ड घुसाऊँगा और कस-कस कर चोदूँगा साली चुदासी हिन्दू राण्ड।” मैंने अपना मुसलमानी लण्ड उसकी चुदासी हिंदू चूत के मुँह पर रखा और हल्के से धक्का दिया। उसने अपने हाथों से मेरे मुसलमानी लण्ड को पकड़ा और गाईड करते हुए अपनी रसीली हिन्दू चूत में डाल दिया। दोस्तों मानो मैं जन्नत में आ गया।

मैं बोल ही उठा, “उफ़, क्या रसीली हिन्दू चूत है सरिता। मज़ा आ गया, सच मे चुदाई का असली मजा़ तो तुम चुदासी हिंदू रण्डियो को चोदने मे ही आता है।” सरिता के नंगे हिंदू जिस्म पर पसीना था, मेरी लम्बी दाड़ी सरिता की मदमस्त चूचियो पर रगड़ रही थी।

उसने भी एक्साइट हो कर कहा, “चोद दो मुहम्मद… बस अब इस रसीली हिन्दू चूत को खूब अपने मुसलमानी लण्ड से जमकर चोदो।”

दोस्तों… चूचियाँ दबाते हुए, होंठ चूसते हुए ज़ोर-ज़ोर से चोद-चोद कर ऐसा मज़ा मिल रहा था कि पता ही नहीं चला कि कब मैं झड़ गया। झड़ते-झड़ते भी मैं उसे बस चोदता ही रहा और चोदता ही रहा।

“सरिता… बहुत टेस्ती चुदाई थी यार। तुम तो गज़ब की चीज़ हो।”

“मुझे भी बेहद मज़ा आया, मुहम्मद, चीज बस आप मुसलमान मर्दों के लिए ही हू” वो कसकर मुझे पकड़ते हुए बोली। उसकी चूचियाँ मेरे सीने से लग कर एक अलग ही आनंद दे रही थी। दोस्तों, फिर बीस मिनट बाद, पहले तो मैंने उसकी चुदासी हिंदू चूत को उसकी ही चड्ढी से पोछा और उसने मेरे गीले, गन्दे मुसलमानी लण्ड को चूसा, हल्के-हल्के। फिर हमने कस-कस कर चुदाई की और इस बार झड़ने में काफी समय लगा। मैंने शायद उसकी चूचियाँ और चुदासी हिंदू चूत और होंठ और गाल के किसी भी अंग को चूसे बगैर नहीं छोड़ा। इतना मज़ा पहले कभी नहीं आया था। बस गज़ब की चीज़ थी वो हिन्दू औरत।

कपड़े पहनने के बाद मैंने पूछा, “सरिता, अब तो तुम्हें और कईं बार चोदना पड़ेगा। अपनी इस प्यारी सी रसीली हिन्दू चूत और प्यारी-प्यारी चूचियों और प्यारे-प्यारे होंठों और प्यारी-प्यारी सरिता डार्लिंग के दर्शन करवाओगी ना?” मैंने उसका फोन नंबर ले लिया और कह दिया कि मैं बता दूँगा जिस दिन मैं दिन में घर पे होऊँगा!

अब वोह मुझसे फ़्री हो गयी थी और बोली, “मुहम्मद, डोंट वरी, जब भी मौका मिलेगा खूब चुदाई करेंगे, आप जैसा मर्द, मुसलमान मर्द किस्मत से मिलता है, हर हिन्दू औरत का सपना होता हैं कि कोई दाड़ीवाला मुसलमान मर्द उसे असली स्वर्ग का मज़ा दे। अब आप जब भी कहेंगे, मैं आपकी चुदासी हिंदू बनने चली आऊगी!”

उसकी यह बात सुनते ही मैंने उसे एक बार और बाँहों में भींच लिया और उसके होंठों का एक तगड़ा चुंबन लिया। फिर वो मेरे बंधन से आज़ाद होकर दरवाजे से बाहर निकल गयी। कुछ दूर जाकर पीछे मुड़ी और एक मुस्कान बिखेर कर धीरे-धीरे मेरी आँखों से ओझल हो गयीl

2 thoughts on “गरमी की दोपहर

    1. सच बात हैं एक बार मैं भी मेरे घर आए मुस्लिम दोस्त को अपनी छोटी बहन वैष्णवी के पास अकेला छोड़ पापा को लेने स्टेशन चला गया था वापस आया तो देखा सलीम नंगी वैष्णवी की बुर चोद रहा था वैष्णवी भी गांड उठा उठा के सलीम से चोदवा रही थमै औऱ पापा ये देख बेहद खुश हो गए

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